Poems
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Poems / Shriji Kavyam
22

Mar

राह अलबेली

जीवन की है राह अलबेली, समझ न कोई पाता है । मेरा-तेरा करके मानव, मिथ्या बोझ उठाता है ।। जीवन की है राह अलबेली… होता जब प्रकृति का तांडव, जीवन का होता संहार । कहे किसे मेरी जमीं और कहे कौन ये मेरा घर ।। जीवन की है राह अलबेली… भेदभाव होता मानव में, ईश्वर करें क्यों भेद ? उसके लिए तो सभी एक हैं, हो नौकर या सेठ ।। जीवन की है राह अलबेली… दैवी आपदा आती-जाती, रहती इस संसार में । कभी न केवल मिटती खुशबू, मानवता के प्यार की ।। जीवन की है राह अलबेली… धर्म सदा ही चलता साथ है, मानव के हर कार्य में । दान- पुण्य की सुवास ही, रह जाती है बाद में ।। जीवन की है राह अलबेली…

09

Mar

श्रीजी ने कहा बच्चों से...

इस बार होली खेलोगे कैसे ? प्राकृतिक रंग अधिक से अधिक उपयोग में लाओगे ऐसे | सारी प्रकृति की सुंदरता, आपमें समाई हो जैसे || सिंदूर, चंदन, हल्दी, कुमकुम, पालक, बीट के रंगों से सजे हैं बच्चें | पक्षियों के पंख विविध रंगों के वस्त्र ओढ़े श्रीजी ने लगाये रंग सच्चे || आनंद-उल्लास नित्य कला संग आप श्री मनाएं होली ऐसे ||

28

Feb

आनन्द बढ़े

सत्संग किये से ज्ञान बढ़े, परोपकार किये से मान बढ़े । त्याग-तप से तेज बढ़े, धन-धान्य बढ़े सुकर्म किये । बुद्धि बढ़े एकाग्र होय से, नीर बढ़े बारिश नित आये । प्रभु प्रीति बढ़े समीक्षा किये, आनंद बढ़े हरि के गुण गाये । आयु बढ़े सत्कर्म किये, शांति बढ़े जप-ध्यान किये । सोच-विचार से क्रोध घटे, लोभ घटे कुछ दान किये । दंभ घटे निज रूप निहारे, आसक्ति घटे प्रभु प्रीति किये । विवेक-विचार से मोह घटे, तन-शक्ति घटे वृद्धापन आये । गर्व घटे नित नम्र बने, सर्व पाप घटे हरि कीर्तन किये ||

21

Feb

शमन खेल रे

मन खेल रे, मन खेल रे, मन खेल रे, मस्त मौला के संग मनवा खेल रे ।। विषय-वासना से जो खेला, दुःख-भय-शोक और रोग ने घेरा । तृप्त हुआ न कभी सुखी तू, इच्छाओं ने मार दबोचा ।। सुखी होना तू जो चाहे तो, तज विषय विष की बेल रे… ।।1।। मत जाया कर वक्त को प्यारे, मन में जप प्रभु नाम सुनहरे । सत्संगति से मन सुदृढ़ कर, कभी सत्संग सुन कभी ध्यान कर ।। कभी शास्त्र पढ़ चिंतन करके, कभी सोहम से मेल रे…।।2।। कीर्तन पे तू नाच-नाच ले, विकारों से तू भाग-भाग ले । गोविंद से तू जो खेलेगा, कभी बेचैन न कभी अकेला । ध्यान की गहराई में उतर जा, छोड़ भव की जेल रे …।।3।। हर रूप में वो है प्रियतम प्यारा, सिवा उसके न कोई नजारा । छोड़ हिचकना, छोड़ सिसकना, गैरों के पैरों पर गिरना ।। मस्त चाल तू चल अपनी, माया के दुःख मत झेल रे..।।4।। देख जरा प्रभु तुझे पुकारे, आजा प्यारे पास हमारे । हो जा हमारा, हम हैं तुम्हारे, हरि के ताल से ताल मिला ले । सुन अनहद का खेल रे, मन खेल रे…।।5।।

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